Tuesday, 28 February 2017

शादी और बच्चे महिला सशक्तिकरण में बाधक ? " .

               गंभीर ज्वलंत समस्या पर एक सारगर्भित संगोष्ठी 'द  वेक' हिंदी मासिक पत्रिका व ताजा चैनल के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित की गयी।   डॉ.  सूफिया यास्मीन ( प्रोफेसर )  कहा कि  सुश्री निवेदिता प्रसाद , ( डिप्टी कमिशनर इन्कमटेक्स ) डॉ. शिवली मुख़र्जी ( टेस्टट्यूब बेबी एक्सपर्ट ) डॉ. मंजुला सिंह ( प्रतिष्ठित समाज सेवी)  सुवसमिता डे ( क्रिमनल लॉयर ) आशीष बसाक (फिल्म मेकर ) विशम्भर नेवर ( डायरेक्टर ताजा चैनेल ) डॉ. करुणा पण्डे , लेखिका , अपनी और से सार्थक पहल करते हुए इस मुद्दे पर रौशनी डालने की कोशिश की।  

प्रसन्न मुद्रा में वक्ता 

प्रोफेसर सूफिया यास्मीन के अनुसार लोकल ट्रैन में सब्जी,फल, बेचने वाली महिलाये इस लिए काम करती है क्योकि उन्हें अपने शराबी पति को पैसे देने पड़ते है दारू पीने के लिए।  घर चलाने से लेकर बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी इन्ही महिलाओं के ऊपर होती है।  ऐसे पुरुष जो दारू पीकर मार -पीट करे तो कौन महिला चाहेगी की वो अपने पति के साथ रहे। यही नहीं ऐसी बहुत सी शिक्षकाएं है जो कालेज आने के पहले ससुराल वालो के लिए खाना बना कर आती है क्योंकि उनके सास-ससुर को बाहर का खाना  पसंद नहीं है और कालेज से घर वापस जाकर बच्चों को ट्यूशन के लिए लेकर जाती है।  अगर कभी  नैक का कालेज विजिट रविवार को  पड़ जाता है तो हम शिक्षकाओं को कालेज जाना पड़ता है ऐसे में ससुराल वाले ताना मारते है की ऐसा कौनसा कालेज है जो रविवार के दिन भी खुलता है।   मशीन बनी ये महिलाये शादी करके पछता  रही है। 


  • निवेदिता प्रसाद , इनकम टैक्स  कमिशनर , हमारे समाज में शादी आवश्यक है ऐसा सब मानते है क्योंकि सबको लगता है अगर शादी नहीं हुयी तो आपकी जिंदगी का कोई मतलब ही नहीं है।  कैरियर को दूसरे नंबर पर रखा जाता है।  लड़की के पैदा होते  ही शादी करनी है का राग अलापना आरम्भ हो जाता है जबकि शादी महिलाओं को असुरक्षा वाला माहौल देती है अपमान ,डांट -फटकार  मारपीट ,आदि।   शादी के बाद बहुत कम महिलाये ही निर्णय ले पाती इसलिए नहीं की उनमे क्षमता नहीं है बल्कि इसलिए की उन्हें अहमियत ही नहीं दी जाती किसी भी विषय में अपनी राय देने की।  देखा जाये तो उनके व्यक्तित्व को एक तरीके से ख़त्म कर दिया जाता है। उसी जगह लड़के को बचपन से ही नौकरी करनी है कह के प्रोत्साहित किया जाता है। ज्यादा पढ़ी -लिखी लड़कियों के साथ शादी करना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें वे दबा कर नहीं रख सकते। परिवार और बच्चो की देख -रेख के कारण अच्छे जॉब वाली महिलाये भी तरक्की के अच्छे अवसर हाथ से जाने देती है क्योंकि वे इतना समय नहीं दे सकती। 

  • डॉ. मंजुला सिंह , दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर के रूप में शुरुआत की , अठ्ठाइस वर्षो से शादी शुदा हूँ और  अब तक आठ नौकरी छोड़ चुकी हूँ मुझे कभी नहीं लगा की शादी  महिला  सशक्तिकरण में बाधा है क्योंकि ये आप पर निर्भर करता है की जिसे आप जीवन साथी बना रही है वो कैसा है। आपकी सोच के अनुसार है या सोच के विपरीत। दूसरी अहम् बात की  प्रजनन एक महिला ही कर सकती है अतः ये उसे ही तय करना है की वो बच्चें कब पैदा करे और उन्हें कैसा माहौल दे । वो बच्चे को जैसा माहौल देगी वे वैसे ही होंगे  अगर घर में मारपीट का माहौल है तो वे यही आगे भी करेंगे क्योंकि उनके लिए जीवन ऐसे ही जिया जाता है। सबसे पहले सोच की बेडिंया काटे और घर के पुरुषों को पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता से निका ले। शादी करने का मतलब ये बिलकुल नहीं की महिला ही समस्त कार्य करे पुरुष को भी हाथ बटाना चाहिए।
  • आशीष बसाक ,फिल्म निर्देशक , लड़कियों को चुनना होगा की वे शादी चाहती है या कॅरियर।  क्योंकि फिल्म इंडस्ट्री में जब तक हीरोइन शादी नहीं करती तब तक उसका कॅरियर ठीक रहता है जैसे ही शादी करलेती है उसका कॅरियर ढलान पर चला जाता है।  इसका मतलब ये बिलकुल नहीं की शादी न की जाये।  अधिकतर लडकिया शादी ही करती है क्योकि सभी महत्वकांक्षी नहीं होती लेकिन जो जिंदगी में कुछ हासिल करना चाहती पहले वे अपने लक्ष्य को हासिल करे तत्पश्चात शादी करे क्योंकि शादी मतलब जिम्मेदारी. 



  • सुवसमिता डे ,आपराधिक वकील , पुरुष प्रधान समाज ही महिलाओं का शोषण करते है ,वे  बर्दाश्त नही करते की उनकी बीबी  उनसे  आगे निकल जाये। क्योंकि उनकी परवरिश ही इसी प्रकार से होती है।  उन्हें समझाया जाता है की अगर बीबी उनसे ज्यादा योग्य होगी तो वो तुम्हारी गुलामी नहीं करेगी। जरुरत है हमारे समाज में बेटे -बेटी के प्रति अलग -अलग बनी हुयी मानसिकता को  बदलने की।  हमारे समाज में छोटी सी छोटी बात के लिए भी बेटे से या पति से पूछा जाता है घर की धुरी पुरुष के ही चारो तरफ घूमती है क्योंकि वो कमाता है जबकि उसी जगह महिला अपना परिवार समझ कर मशीन की तरह से कार्य करती है।  जो महिलाये अपने दम पर कुछ करती है तो उनके बारे में गलत धारणा बना ली जाती है।  जैसे की मैं क्रिमिनल वकील हूँ तो सबको  लगता है की इसका तो पुलिस वालो के साथ उठना बैठना होता है तो जरूर चरित्र ख़राब होगा। उनकी सोच की अगर हम परवाह करेगे तो आगे कैसे बढेंगे सबसे पहले सशक्तिकरण हमारे अंदर होना चाहिए। बहुत सी महिलाये अपने पति की मार इस लिए  खाती  है की अगर उनका पति उन्हें छोड़ देंगा तो वो कैसे रहेगी। सुरक्षा  के लिए एक मर्द तो साथ चाहिए. लेकिन वे ये भूल जाती है की बच्चे जो हिंसा देख रहे है कल को यही  हिंसा उन्हें स्वस्थ जीवन  जीने नहीं देगी। लोग अक्सर दोष देते है की महिलाये 498 का गलत फायदा उठा रही है तो सीधी सी बात है  अगर किसी को मिर्ची का पाउडर दे दे तो ये उसपर निर्भर करेगा की वो खाने में डाले या आँख में।
  • विशम्भर नेवर, डायरेक्टर ताजा चैनल , युधिष्ठर जब निराश होकर संन्यास लेने लगे तो वहां  उपस्थित सन्यासी ने कहा की " सन्यास लेना कायरता है सच्चा मनुष्य वही है जो जीवन में उपजी समस्याओं को सुलझाए. " जिस तरह एक सिक्के को दो पहलु होते है उसी प्रकार प्रत्येक बात के भी दो पहलु होते है।  डिवोर्स आया सभी ने कहा की बहुत गलत है लेकिन ये नही सोचा की महिलाओं पर शादी के बाद कितने अत्याचार होते थे।  ऐसे ही राजस्थान में पहले हवेलियां हुआ करती थी उन हवेलियों में एक कमरा गन्दा रखा जाता था जिसकी साफ -सफाई कभी होती ही नहीं थी क्योंकि वहां महिलाओं का प्रसव करवाया जाता था और वो प्रसव दइया करवाती थी।  जब डाक्टरो द्वारा प्रसव कराया जाने लगा तो लोगो ने बड़ी आलोचना की।  पुरुष को लगता है की औरत को बच्चा चाहिए औरत को लगता है बिना बच्चे के वो पूर्ण नहीं है उसकी इस कमजोरी का वो शोषण करता है समस्याएं बाहर से नहीं आयी है वरन वे हमारे बीच से ही उत्पन्न हुयी है इसलिए इनका समाधान हमें ही निकलना है।  परिवार कभी बाधा नहीं होता बाधा उस परिवार की सोच हो सकती है। जब कभी समाज में परिवर्तन आता है तो आलोचनाएं -समालोचनाएँ होती ही है धीरे -धीरे सभी इसके आदि हो जाते है।
  • डॉ. शिवली मुखर्जी , अपनी  डिग्रियों को लेने के लिए हमे बहुत मेहनत करनी पड़ी किन्तु मेरी मम्मी ने मेरी डिग्री देखते ही हाथ खड़े कर दिए की तुम्हारे लिए मैं लड़का नहीं खोज सकती मैंने सोचा चलो मैं ही देखती हूँ अपने स्तर के अनुसार एक जगह बात भी बनी किन्तु जब लड़के के माता - पिता ने देखा तो उन्हें लगा की ये लड़की कम लड़का ज्यादा है।  मुझे भी लगा की शादी कही न कही मेरे लिए बंधन साबित होने वाली है इसलिए अपने प्रोफेशन को बनाये रखने के लिए मैंने शादी का इरादा छोड़ दिया। दूसरी बात जो  मेरे दिल में दर्द बन कर बस गई थी वो ये थी की मेरी माँ शादी से पहले बहुत अच्छा गाती थी  और शादी के बाद उन की हॉबी ने घर -गृहस्थी के चलते दम तोड़ दिया। सरोगेसी और टेस्टट्यूब बेबी पैदा करवाना मेरा पेशा है। मैंने अक्सर देखा है की बच्चा हमेशा महिला चाहती है वही बच्चे के लिए आती है और बच्चे का सारा खर्च  लड़की के माता- पिता उठाते है कभी भी लड़के के परिवार वाले पहल नहीं करते।  इस लिए मेरा मानना है की शादी और कैरियर में से किसी एक को ही चुना जा सकता है अतः ये महिला पर ही निर्भर करता है की वो क्या चाहती है 
शकुन त्रिवेदी ,संपादक 'द  वेक' हिंदी मासिक पत्रिका विशम्भर नेवर डायरेक्टर ताजा चैनल , 

शुभ्र त्रिवेदी गाना गाती हुयी 

DR. SHIULI MUKHERJEE WITH DR. KARUNA PANDE WRITER.

SUVASMITA DE (ADVOCATE) WITH RICHA TRIVEDI

च ये है की नारी के हिस्से में आज भी चुभन, टूटन, तड़पन, और बिखरन है।  वो बच्चे को आया के सहारे छोड़ कर जाती है तो भी कुंठा ग्रस्त होती है।  घर की चहारदीवारी में कैद होकर श्रीमती और मम्मी के रूप में  अपनी पहचान उनके नाम से बना कर भी खोखली ही रहती है। उनके सामने विकल्प के रूप में कुछ भी नहीं है या तो वे कॅरियर चुने या शादी।  दोनों के साथ जीवन यापन करना महिला को रोबोट बना देता है ऐसी स्थिति में इस समस्या का हल  क्या है क्या होना चाहिए , आवश्यकता है इस पर गंभीरता के साथ विचार करने की क्योंकि शादी के बिना  भी महिलाये   अधूरी है और शादी कर के भी बहुत सी महिलाएं बिखरी हुयी है। इस कार्यक्रम का सञ्चालन 'द वेक' हिंदी मासिक पत्रिका की संपादक शकुन त्रिवेदी ने किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में अहम् भूमिका निभाई शुभ्रा त्रिवेदी, राजेश मिश्रा  जैस्मिन खान .

Thursday, 8 September 2016

जंक फ़ूड सेहत के साथ खिलवाड़

जंक फ़ूड, सेहत के साथ खिलवाड़ 
क्यों और कब तक ?
   एक स्कूल में  बच्चों के साथ जंक फ़ूड के दुष्परिणाम के ऊपर चर्चा चल रही थी।  क्लास सिक्स से लेकर क्लास टेन तक के बच्चें शामिल थे।  सबके लिए चिप्स, कुरकुरे, पिज्जा ,बर्गर पसंदीदा भोज्य।  ऐसे में    उनसे ये  कहा जाये की ये सब उनकी सेहत के लिए सही नही है और इन्हें बंद करना होगा तो सोचिये उनकी मनोस्थिति क्या होगी।  कितनो को तो ये चिंता सता  रही थी की अगर इन सब पर बैन लग गया तो उनके स्वाद का क्या होगा।  किसी के सामने समस्या थी की उसकी माँ के पास समय नही है रसोई में पकाने का ऐसे में वो उसे क्या खिलाएगी या वो क्या खायेगा।  यही नही कुछ  बच्चों के सवाल थे की टीवी आये दिन दिखा ता है की  प्रत्येक खाने वाली वास्तु जहरीली हो रही है तो हम क्या खाये क्या हवा खाकर रहे.   एक बच्चें का सवाल था की बाबा रामदेव भी बाजार में उत्तर आये है अपनी मैगी और चॉकलेट के साथ तो क्या वो भी नही  खाना चाहिए। किसी बच्चे का प्रश्न था की  चाउमीन ,पानी बताशे ,भेलपुरी ,टिक्की चाट कितना कुछ है मजेदार और स्वादिष्ट , केवल रोटी ,दाल ,चावल से ही तो संतुष्टि नही मिल सकती।  तो कोई बच्चा मैगी की तरफ दारी  कर  रहा था की मैगी दो मिनट में बन जाती है  इतने कम समय में कोई दूसरा   स्नेक्स तैयार नही हो सकता।  बच्चों के इतने सारे सवालो के बीच    एक छोटे से बच्चें ने   पीछे की बेंच से  कहा की वो घर का पका खाना खाना चाहता है लेकिन उसकी माँ के पास समय ही नही है।  बच्चों के सवालो के बाद बारी थी हम लोगो के उत्तर देने की।  साथ ही उनके सवाल मन - मस्तिष्क को झिंझोर रहे थे की बाजारवाद   बच्चों की सेहत के साथ कैसा खिलवाड़ कर रहा है।  इनके खिलाफ न कोई कानूनी करवाई ( जैसा की बहुत से देशो ने कर रखा है ) न इन्हें बंद करने की चेष्टा।  और तो और विज्ञापन  कम्पनियाँ बच्चों  से  ही चॉकलेट ,चिप्स , मेगी आदि के कितने विज्ञापन करवाती है जो की किसी भी बाल मन को बरबस ही अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है ।  लोगो के दिलो पर राज करने वाले  रोल मॉडल लोकप्रिय क्रिकेट खिलाड़ी कोल्ड ड्रिंक का विज्ञापन करते है जिसे देखकर बड़े और बच्चें दोनों ही उ नका अनुसरण करने लगते है।   इन्हें रोकने या बंद करने के लिए    सरकार,  संस्थाएं,समाज कोई भी  न आवश्यक कदम उ ठा ती है और न ही आवाज।  वे भी इनके स्वाद में इतना खो गए है की उन्हें इसकी जरूरत ही समझ में नही आती।  अगर    इतने स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ यदि पैसा फेकने पर आसानी से उपलब्ध हो जाये तो उसमे बुराई क्या है  रही बात सेहत की तो जगह -जगह नर्सिंग होम है और न जाने कितने खुलने के लिए तैयार बैठे है वैसे भी इन्हें अपना व्यवसाय तो बीमारों की तीमारदारी कर के ही बढ़ाना है  जिसमे उनका सहयोग दे रहा है फ़ास्ट फ़ूड बाजार और नई पीढ़ी ।  भारत में बुराई को बढ़ावा देना कोई नयी बात नही है क्यों की हम सभी बाहर की वस्तुओं का स्वागत दिल खोल कर करते है चाहे वो परिधान हो या फिर खान- पान।  बाहर  की वस्तुएं इस तरह से समाज पर हावी  होती है  जैसे भारत में  इन के आने के पहले न कोई भोजन था और न ही वस्त्र।   मिडिया भी यहाँ की जनता की कमजोरी जानती है इसलिए  वही दिखाती है जिससे उसकी कमाई होती है।   सेहत  , समाज , सिद्धान्त , संस्कृति,   बच्चे , नैतिकता ,उसके लिए सब बेकार।  किया भी क्या जाये कही धन की माया तो कही  बुराई की चुम्बकीय शक्ति वैसे भी बुराई का आकर्षण जबरदस्त होता है उसकी गिरफ्त में इन्सान आसानी से आ जाता है।  जो भी हो   पैक्ड फ़ूड ने कार्यरत महिलाओं की जिंदगी को आसान बना दिया। गृहणियों को किचन से निजात दिला   दी ।  अब आराम से वे मोबाईल , इन्टरनेट, व्हाट्सअप  की दुनिया जी सकती है। रहा सवाल बच्चों की सेहत का तो उसके लिए तमाम तर्क है  कि  क्या खाये ? सभी में तो मिलावट है। सब्जियां रंग की हुयी है , त्योहारों के समय मिठाईया जहरीली हो जाती है ।    फलो  मे चमक पैदा  करने के लिए मोम चढ़ा रहता है   या फिर  वे हाई ब्रीड वाले होते है । गेहू  चावल की बढियां पैदावार  के लिए यूरिया,   केमिकल  वाली खाद का इस्तेमाल होता है आदि ।  ये सवाल स्वाभाविक है क्यों की आये दिन हम लोग समाचार सुनते है और देखते है मिलावट का आलम।  किन्तु सवाल दागने वाली ये नही समझती की रास्ता भी इन्ही के बीच से निका लना है। मौसमी फल और सब्जियां खाने से केमिकल शरीर में उतना नही जाता जितना की बे मौसम की सब्जी या फल उपयोग में लाने से।  दूसरी अहम बात की सेब , परवल ,टमाटर आदि को हल्के गुनगुने पानी में भिगो दे उनपर चढ़ा रंग अपने आप ही उतर जायेगा।  दाल ,चावल को बनाने से आधे घंटे पहले भिगो देने से उनका केमिकल ख़त्म हो जायेगा।  घर मे पकाये जाने वाले खाने में इस्तेमाल किया जाने वाला तेल अच्छी कंपनी का होगा जबकि सड़क पर बिकने वाली चाट, समोसा ,पानी बताशा आदि सस्ते तेल में बनाये जाते है  क्योकि उन्हें कमाना है।   उसी जगह  बच्चों के लिए घर पर पकाया जाने वाला खाना उनकी पसंद और सेहत दोनों से जुड़ा होता है।  लेकिन पहले की अपेक्षा आजकल की बहुत सी माताएं  आलसी हो गयी है या उनकी प्राथमिकताएं बच्चें की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण हो  गयी है।  क्योकि अब वे किचन में जाकर बच्चें के लिए पकाने से बेहतर  पिज्जा,बर्गर मंगवाना  अच्छा और आसान   समझती है। आजकल काम वाली बाई को रखना फैशन में है  जो महिलाये किचेन में काम करती है उन्हें  हेय दृष्टि से देखा जाता है।  जबकि हमारे समय में  माताए घर पर ही तरह -तरह के व्यंजन बनाती थी , क्योंकि उन्हें अपने पाक शास्त्र पर प्रश्न चिह्न लगवाना   पसंद नही था उनकी नजर में जो स्त्रियां पाककला में कुशल नही होती थी वे गवाँर या फूहड़ के नामों से पहचानी जाती थी। आज भी छोटे शहरो और गाँवो में बाहर से खाना खरीद कर खाने का चलन नही है। लेकिन अगर यही आलम रहा तो वो दिन दूर नही जब घर -घर पिज्जा, बर्गर , मोमो ,चाउमिन भोजन का स्थान ग्रहण कर लगे ठीक वैसे ही जैसे लस्सी, शरबत का  स्थान  सॉफ्ट  ड्रिंक ने ले रखा है।  गाँवो की छोटी - छोटी दुकानों पर धूप की मार  सहती  कोल्ड ड्रिंक की बोतले लोग  इतने गर्व से  खरीदते है जैसे   इन बोतलों में  इनका सम्मान छिपा हो।  हम कहाँ जा रहे है और क्यों जा रहे है बिना विचारे  हर कोई  दौड़ रहा है जो स्वस्थ है वो जंक फ़ूड के लिए जो इन्हें खा कर बीमार  पड़  गए वे डॉक्टर के पास बिना ये सोचे की उनकी बीमारी की वजह क्या है।  पढ़े -लिखे लोग भी ये जानने की आवाश्यकता नही समझते की वो जो खा रहे है उसमे क्या है और वो उनके स्वस्थ्य  के लिए कितना हानिकारक है। जंक फ़ूड या फ़ास्ट फ़ूड ` खाने से केलोस्ट्रोल बढ़ता है।  अतिरिक्त नमक जाने से हाई ब्लॉडप्रेशर का शिकार बन जाता है।  मोटापा बढ़  जाता है , थकान मह्सूस होने लगती है , हाँफने  लगता है। सर में दर्द होता है ,घबराहट बढ़ जाती है हृदय रोग की सम्भावना दिखने लगती है। लेकिन स्वाद के आगे सब हारे है ठीक वैसे ही जिस तरह   सिगरेट पीना हानिकारक है उस के ऊपर लिखा होने के बावजूद भी लोग सिगरेट पीते है। आवश्यकता है ये समझने की कि   अच्छी सेहत अमूल्य धन   है इसे संजो कर रखना   प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है इस  दिशा में सर्व प्रथम कदम उठाने वाला राज्य पंजाब  है जिसने स्कूल और उसके आस- पास जंक -फ़ूड स्टाल पर रोक लगा दी।  सीबीएससी बोर्ड ने भी बच्चों की सेहत को ध्यान में रखते हुए जनवरी 2016  में एक सर्कुलर जारी किया जिसमे  स्कूल केंटीन में जंक फ़ूड बिक्री करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। इसी  तरह    दूसरे राज्य और स्कूल प्रतिबन्ध लगाना आरम्भ कर दे एवं बच्चे के माता पिता ये सोच ले की हम इन्हें  रोज नही खरीदेगे  महीने में एक -दो बार ठीक है  तो अपने बच्चों औए स्वयम को इस धीमे जहर से बचा सकते है।  
जंक फ़ूड की जगह लेने वाले पौष्टिक आहार,
  1. लहिया ( मूडी या लाइ ) ,चना ,मुमफली तीनो को मिला कर किसी डब्बे में भर कर रख ले। 
  2. अंकुरित अनाज (चना, मुंग दाल ,मुमफली ) इन्हें रात भर भिगो कर रखे , सुबह निकाल कर साफ कपडे में बांध कर रख दे।  अंकुर आने पर उन्हें धोकर लहसुन ,प्याज, नमक हरी मिरच नीबू मिला कर खाये। 
  3. सत्तू का मीठा शरबत  प्रोटीन का अच्छा स्रोत है ये सेहत के लिए सर्वोत्तम है।  
  4. काला नमक , भुना जीरा,   नीबू और दो चमच्च  सत्तू डालकर नमकीन   शरबत तैयार करे ,प्रोटीन और विटामिन सी  का अच्छा स्रोत है।
  5. नीबू शहद पानी ऊर्जा देता है। 
  6. गुलाब ,बादाम शरबत ,केसर वाला दूध। 
  7. पोहा, उपमा ,हलुवा जल्दी पकने वाले स्वादिष्ट व् सेहत वाले खाद्य पदार्थ है। 
  8. फल , मेवे, सलाद  आदि। एयर टाइट डिब्बों में सलाद और फल काट कर फ्रिज में रख दे ,भूख लगने पर बच्चा स्वयं निकाल कर खा सकेगा। 
जंक  फ़ूड विज्ञापनों और खाद्य वस्तुओं पर प्रतिबन्ध लगाने वाले  देश    
  1.  नार्थ कोरिया 
  2. जिम्बावे 
  3. बोलविया 
  4. कैनाडा ,   १९८० में एक कानून बनाया जिसमे बच्चों के लिए तैयार किये जाने वाले  जंक फ़ूड प्रतिबंधित। 
  5. चिली  , बच्चों को प्रभावित करने वाले जंक फ़ूड विज्ञापन पर प्रतिबन्ध 
  6. फ्रांस , एक दिन में पाँच फल और सब्जियां सेहत के लिए आवश्यक 
  7. यू के.  नमक ,चीनी, वसा की अतिरिक्त मात्रा वाले खाद्य प्रतिबंधित 
  8. नॉर्वे , बच्चों की सेहत को प्रभावित करने वाले खाद्य पदार्थो के विज्ञापन पर प्रतिबन्ध  
जंक  फ़ूड खाने वाले दस श्रीश देश 
  1. यु एस ऐ। 
  2. फ्रांस 
  3. यू के 
  4. कैनाडा 
  5. साउथ कोरिया 
  6. जापान 
  7. ऑस्ट्रिया 
  8. जर्मनी 
  9. स्विट्जरलैंड 
  10. स्वीडन
Discussion over Junk food in BDM International School.

Hindi teacher Mrs. Ghate addressing children.

Traditional way of welcome to guest.



Children patiently hearing about
Junk foods are always harmful to the heath and deteriorate the health ..."

Dr. Karuna Pandey.


 Shakun Trivedi Editor " THE WAKE" Hindi monthly
addressing d children.


Smiling face Mrs. Vijaya Chaudhury, principal BDMI,
Shakun Trivedi,Dr. Karuna Pandey.








BDMI 's principal Mrs. Vijaya Chaudhury, Lekha Sharma ,Secretary , International Lions club Dist. 322B1,Shakun Trivedi, Editor 'THE WAKE' monthly magazine. 
Dr. Karuna Pandey ,Writer. along with participant. 


Tuesday, 24 March 2015

'मुझे जीने दो' कन्या भ्रूण हत्या

 द वेक ' हिंदी मासिक पत्रिका द्वारा कन्या भ्रूण हत्या   ' मुझे जीने दो' पर ' एक इंटर स्कूल नृत्य प्रतियोगिताआईसीसीआर सभागार में  आयोजित की  .कार्यक्रम का उद्घाटन महामहिम श्री केशरीनाथ त्रिपाठी ( राज्यपाल पश्चिम बंगाल ) द्वारा किया गया। महामहिम श्री केशरीनाथ त्रिपाठी ( राज्यपाल पश्चिम बंगाल ) ने अपने वक्तव्य में कहा की पहले बेटियां बोझ  समझी जाती थी जब वे शिक्षित नहीं होती थी।  किन्तु आजकल बेटियां शिक्षित होने के साथ -साथ अपने माता-पिता की जिम्मेदारी भी उठाती है, फिर भी  उन्हें गर्भ में मारा जाता है ये हमारे समाज के लिए कलंक है। आपने  अपने वक्तव्य का अंत अपनी चार पंक्तियों ' भ्रूण परीक्षण कही हो रहा ,मृत्यु अजान जान खा जाती है वंश अनुक्रम की अभिलाषा ,कितनी कलियों को मुरझाती , मंगल मानस जब हुआ प्रदूषित ,ढोर उसे चरता आया है। ",के साथ किया।   शास्त्रीय संगीत की मल्लिका गिरिजा देवी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की , पैटन हाउस के चेयरमेन श्री एच पी बुधिया, नेपाल के कंसुल जनरल चन्द्र कुमार घिमिरे ,ताजा चैनल के निदेशक विशम्भर नेवर  , पी आर गोयनका ओंकार बांग्ला चैनल के चेयरमेन आदि विशिष्ठ अतिथि थे। इस कार्यक्रम में विशेष प्रस्तुति 'धवल' द्वारा ' मुझे पंख दे दो ' गीत पर नृत्य  था।  शुभ्रा त्रिवेदी ने 'कोमल है कमजोर नहीं तू शक्ति का नाम ही नारी है '  गाना  गाकर  महिला शक्ति का परिचय देते हुए सबको मुग्ध कर दिया। 
   इस प्रतियोगिता में एशियन इंटरनेशनल स्कूल , बीडीएम इंटरनेशनल ,इंडस वैली ,सेंट स्टीफेन स्कूल, माहेश्वरी बालिका विद्यालय ,सेठ सूरजमल जालान बालिका विद्यालय ,ज्ञान भारती बालिका विद्यालय ने भाग लिया।  चयनकर्ता,सुरेन्द्र मुंशी ( अवकाश प्राप्त प्रोफेसर आईआईएम)  सायरा शाह हलीम (रंगकर्मी ) डॉ सुधा दत्ता (ओडिशी नृत्यांगना )श्रीमती शकुंतला तिवारी (अध्यक्ष ,शाकुन्तल महिला कान्यकुब्ज समिति ) ने नृत्य प्रतियोगियों  की   नृत्यकुशलता के आधार पर प्रथम ,द्वितीय ,तृतीय पुरस्कार का चयन किया।    सुप्रसिद्ध गायिका गिरिजा देवी  ने प्रथम पुरस्कार  अपराजिता ग्रुप ( बीडीएम इंटरनेशनल स्कूल)    , दितीय पुरस्कार आदिवित्या ग्रुप (इंडस वैली )  तृतीय पुरस्कार (महेश्वरी बालिका विद्यालय ) के चिरैया ग्रुप  के बच्चों को   दे कर कार्यक्रम की गरिमा को चार चाँद लगा दिया। इस अवसर पर स्वागत भाषण मनोज त्रिवेदी (प्रबंध संपादक 'द  वेक' ) ने दिया ,कार्यक्रम का संचालन 'द वेक ' पत्रिका की संपादक शकुन त्रिवेदी द्वारा किया गया।  कार्यक्रम को सफल बनाने में शुभ्रांशु त्रिवेदी ,शौर्याँक ,राजेश मिश्रा ,शिवरतन डालमिआ निर्मल अग्रवाल सुजीत आदि की अहम भूमिका थी।    
कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध  जागरूकता लाने  लिए 'द वेक' हिंदी मासिक पत्रिका द्वारा आयोजित कार्यक्रम  'मुझे जीने दो '   की झलकियाँ। 









































Dhaval Dance group choreographed by Shubhra Trivedi 

Dhaval Dance group choreographed by Shubhra Trivedi 


Dhaval Dance group choreographed by Shubhra Trivedi 

BDMI School's powerful act .


Indus Valley Children  performing dance
" Agle janam Mohe bitiya na kijo 

Arundhati group from Gyan Bharti Balika Vidyalay 



Children of Maheshwari Balika vidyalay " O ri Chiraiya" 





Jwell group from St. Stiffen  School.







Winner of the competition , BDMI & Indus Valley school.

Winner of the competition , BDMI & Indus Valley school.


Odishi dancer Dr. Sudha Dutt with Shakun Trivedi 





Chiraiya group stood third in dance competition ready for shoot with trophy 




Judges 



 contestant 

Prize distribution 


Adarniya Appa ji ( Padam vibhushan Girija devi, Classical singer )
Dr. Sudha Dutt , Shubhra Trivedi with me & my mother in law.

धवल ट्रॉफी के साथ