Monday, 28 May 2018

 द वेक हिंदी मासिक पत्रिका द्वारा आउट राम जेटी के गंगेश्वर मंदिर में गंगा दशहरा के उपलक्ष में भजन संध्या, गंगा आरती और दीपदान का आयोजन किया गया। भजन संध्या का आरंभ शोर्यांक ने रावण द्वारा रचित  शिव स्तुति "जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले " गाकर किया तत्पश्चात शुभ्रा त्रिवेदी ने "मानो तो मै गंगा मां हूं, गंगा मैया में जबतक कि पानी रहे " जैसे सुरीले गीत गाकर सबको मंत्र मुग्ध कर दिया। वहां उपस्थित श्रद्धालुओं, शालिनी डब्रिवाल, नीतू द्विवेदी, मंजू पोद्दार आदि ने भी भजन  गाकर इस पर्व के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की। मनोज त्रिवेदी व उनके साथ उपस्थित सभी भक्तों ने गंगा आरती  व दीपदान किया। हारमोनियम  पर साथ देने वाले उस्ताद फैयाज खान , तबले पर बाबू भाई व साबिर ने  गंगा आरती के बाद अपना रोजा खोल कर आपसी सोहार्द का परिचय दिया। इस अवसर पर उपस्थित थीं "शाकुन्तल कान्यकुब्ज महिला समिति "की अध्यक्षा शकुंतला तिवारी , रेखा बाजपेई, नीतू द्विवेदी, अमिता पुरोहित, जया दुबे, राजकुमारी कर्नानी, बनिश्री बाजोरिया, ऊषा चौधुरी,सुधा बाजपेई,ओम प्रकाश लड्ढा,  शुभ्रांशु, आभा तिवारी, राधा चौधूरी, राजेश बाजपेई , गणेश धनानिया आदि।कार्यक्रम को सफल बनाने में द वेक की संपादक शकुन त्रिवेदी एवम् राजेश मिश्रा की अहम भूमिका थी।
गंगा घाट पर आरती करते हुए मनोज त्रिवेदी ,शकुन त्रिवेदी व् अन्य



प्यासों   के लिए शरबत हाजिर है 

Wednesday, 11 October 2017

भारत का भविष्य २०१९

 भारत का  भविष्य २०१९  (संगोष्ठी )


द वेक हिंदी पत्रिका व् जनसंसार के संयुक्त तत्वाधान में एक संगोष्ठी भारत का भविष्य २०१९ राजनैतिक ,सामाजिक, आर्थिक  का आयोजन किया गया।  
विश्वहिंदू परिषद्  कोलकाता  के उपाध्यक्ष सर्वेश राय    के अनुसार सऊदी अरब में बहुत सी मस्जिद, मजार हटा के पार्क बनाये गये वहां किसी ने इसका विरोध नहीं किया हमे भी  इसी तर्ज पर मंदिर ,मस्जिद , मजार जो विकास के कार्य को प्रभावित कर रहे है उन्हें हटा कर स्कूल बनाने चाहिए।   
ओंकार बांग्ला चैनल के चेयरमेन प्रह्लाद राय गोयनका,  आजकल धार्मिक उन्माद चल रहा है एक -एक धार्मिक आयोजन में लाखों ,करोड़ों रूपये खर्चा होते है। एक -एक कार्ड पर तीन सौ लोगो के नाम छपे होते है।  इस तरह के आयोजन दिखावा मात्र है ना कि  लोगो तक ज्ञान पहुंचाने का माध्यमअगर इन पर रोक नहीं लगी तो भविष्य में इस तरह के आयोजनों पर और भी पैसे की बर्बादी होगी। देश में  आतंक का वातावरण बन रहा है जो की अच्छा नहीं है भविष्य में ऐसे तत्व आएंगे जो सिर्फ बम और बन्दूक की बात करेंगे। 
ओ. पी शाह ,अध्यक्ष सेंटर फार पीस एंड प्रोग्रेस , कश्मीर अब बदल रहा है वहां के नौजवान भाई -चारे के साथ सभी धर्मों के त्यौहार मनाना चाहते है ऐसी ही एक पहल दीवाली को लेकर की जा रही है जिसमे दूर दूर से लोगो को बुलाया जा रहा है। कश्मीरियों में विश्वास और सवांद केंद्र सरकार स्थापित करे तो कश्मीरी निवासी  भारत के अन्य प्रांतों के लोगो से जुड़ सकते है। कश्मीरियों को मिडिया से भी शिकायत है उनके अनुसार मिडिया कश्मीर की सही स्थिति नहीं दिखाती है। 
छपते -छपते के सम्पादक व् ताजा चैनल के डायरेक्टर बिशम्भर नेवर ने कहा समाज में मिडिया की अहम् भूमिका है लेकिन आज की मिडिया निष्पक्ष नहीं है।  आज कल मिडिया में बड़े -बड़े घराने  अपना पैसा लगा रहे वो लोग अपनी ही बात करेंगे. मिडिया भी राजनितिक खेमों में बट गया है। जो जिस खेमे का है वो उसी खेमें की बात करेगा।  सच्चाई क्या है ये बताने के लिए गिने चुने पत्रकार है। तथ्यों  के साथ कोई भी आंकड़े प्रस्तुत नहीं करना चाहता। मृणाल पांडे व् कुलदीप नैयर पूर्ण रूप से निष्पक्ष नहीं है  फिर भी  इनके लेख पढ़े जा सकते है। जनसत्ता दैनिक समाचार पत्र का सर्कुलेशन ज्यादा नहीं लेकिन उसके समाचार और लेख निष्पक्ष होते है।  
विजय ओझा -भाजपा पार्षद (४७ वार्ड कोलकाता), २०१९ में भी भाजपा का कोई विकल्प नहीं।  रही बात बढ़ रही गौ हिंसा , धार्मिक हिंसा तो ये सामयिक बुखार है। जी एस. टी से कार्य करने में असुविधा हुयी है ये मानते है लेकिन ये कोई  पहाड़  का पत्थर तो नहीं जो बदल नहीं सकता। जब हमारे संविधान में संशोधन  हो सकता है  तो  जी एस. टी में  भी  बदलाव होगा । नोटबंदी  साहसिक कदम। नकली नोटों का व्यापार ,नशे का कारोबार बंद हुआ। 
 इस कार्यक्रम के अध्यक्ष "इंडो- वियतनाम सॉलिडेरिटी कमिटी के प्रेसिडेंट व् प्रख्यात लेखक गीतेश शर्मा ने कहा की २०१९ में भी हिंदुत्व का मुद्दा छाया रहेगा , गौ रक्षा की हम बड़ी बड़ी बात करते है जबकि गोस्वामी तुलसी दास ने कहा है की " गौधन ,गजधन ,बाजधन और रतन धन खान,  जब आवे संतोष धन सब धन धूरि सामान। आप लोग गौ का दान करते है और उसे माता भी कहते है क्या कोई अपनी माता  का दान कर सकता है। गाय बेचने वाले को देशभक्त और काटने वाले को गुनहगार.  ८० % मुसलमान हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था को बना कर रखता है।  भारत में चाईना से भगवान आ रहे है किसी ने इसका विरोध नहीं किया जबकि प्राण प्रतिष्ठा उसी भगवान् की होती है जो आपके देश की मिटटी से बने होते है। देश पीछे जा रहा है।  अर्थव्यवस्था ख़राब हो रही है।  कार्यक्रम के उपरांत प्रश्नोत्तर का दौर चला जो बहुत ही मजेदार था। उपरोक्त कार्यक्रम का सञ्चालन 'द  वेक ' पत्रिका की  सम्पादिका शकुन त्रिवेदी ने किया , 














धन्यवाद ज्ञापन  " द वेक" के प्रबंध संपादक मनोज त्रिवेदीने दिया। कार्यक्रम को सफल बनाने में शौर्यांक ,जयादूबे , जैस्मिन की अहम् भूमिका थी।  इस अवसर पर उपस्थित थे बिमल शर्मा ,रावेल पुष्प , प्रेम कपूर, कवियत्रि कुसुम जैन ,, सुनीता निगम ,सुधीर निगम, सीताराम अग्रवाल , जीवन सिंह आदि। 

Monday, 11 September 2017

हर्ष -उल्लास का त्यौहार दुर्गा पूजा






परंपरा, कला, कारीगरी, वैभव , हर्ष -उल्लास का त्यौहार दुर्गा पूजा एक बार फिर से दस्तक दे रहा  है। एक तरफ जहाँ टीवी चैनल बाढ़ की विभीषका बता  रहे है, बाढ़ से पीड़ित परिवारों की व्यथा कथा सुना रहे है , एक समय की रोटी के लिए तरसते हाथ दिखा रहे है वही दूसरी ओर  माँ दुर्गा का स्वागत खुले दिल से  करने के  लिए उसकी तैयारी पू रे -जोर शोर से चल रही है। बाजार अपने यौवन से लबरेज ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए रोज नए -नए हथकंडे अपना रहे है।  ग्राहक भी नौ दिन की तैयारी योजना बद्ध होकर कर रहे है। चार दिन ( सप्तमी ,अष्टमी ,नौमी ,दशमी ) क्या खाना ,क्या पहनना ,  कहा घूमना आदि।   जीएसटी का रोना रोते ( कुछ भी तो सस्ता नहीं है) ग्राहकों के मुंह का स्वाद  तब कसैला हो जा ता है जब उन्हें अपने बिल में अतिरिक्त कर जुड़ा दिखाई देता है। फिर भी उनके जोश में कोई कमी नहीं दिखती।  बंगाल की दुर्गा पूजा है ही ऐसी।  विभिन्न विषयों पर आधारित ,बेजोड़ कारीगरी से तराशे गए पंडाल, उत्कृष्ट कला को जीती प्रतिमाएं , अनेक  प्रकार के   रंगों एवं सुन्दर आकृतियों की छटा बिखेरती विद्युत् झालरे,  बरबस ही आने -जाने वालों का ध्यान आकर्षित कर लेती है।   किसका पंडाल ,किसकी मूर्ति ,किसकी विद्युत् सज्जा सर्वश्रेष्ठ है ये जानने के लिए बहुत से संगठन ,कम्पनिया, मिडिया पुरस्कार घोषित करती है।  सड़कों पर उमड़ती भीड़ रात की उपस्थिति को नकार देती है। बच्चें ,बड़े ,युवा सभी बेसब्री से इंतजार करते है इस त्यौहार का  किन्तु युवक -युवतियों की ख़ुशी की कोई सीमा नहीं होती क्योंकि इस दौरान उनकी घडी थम जाती है। नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते , लज्जा -मर्यादा  जैसी दकियानूसी सीमाओं को लांघते  स्वतंत्र ख्यालों वाले  युवक -युवतियां , बिना रोक -टोक देर रात तक डांडिया और दुर्गा पूजा का आनंद उठाते है।  एक बाईक पर तीन -चार लोगो का बैठ कर हुड़दंग मचाते हुए निकलते है  , लड़के -लड़कियों का समूह जहाँ -तहा खाता पीता ,घूमता दिखाई देता है। पाबंदी ,,भय ,अनुशासन सभी छुट्टी पर चले जाते है। ऐसे में आपराधिक तत्व भी सक्रिय हो जाते है।  गाड़ियों में बैठी महिलाओं पर अश्लील भद्दे फिकरे कसना , उनकी गाड़ियों का पीछा करना, कम उम्र की बच्चिंयों को छेड़ना उनका पसंदीदा गेम है हालाकिं पुलिस मुस्तैदी से तैनात रहती है परन्तु किस गली और नुक्कड़ पर ये सिरफिरे अपनी गन्दी योजनाओ को अंजाम देंगे ये किसे पता रहता है। आजकल ,टेक्सी ,बस ,ऑटो ,उबेर कुबेर किसी पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता है अतः त्यौहार का मजा कही  किरकिरा न हो जाये इसलिए पहले से ही योजना बनाते समय इस बात पर अवश्य ध्यान दे की  आपकी सुरक्षा आपके हाथों में है।  














Tuesday, 29 August 2017

कोलकाता के अंतराष्ट्रीय  पुस्तक मेले में राजकमल प्रकाशन के बुक स्टाल पर एक संगोष्ठी आयोजित की गयी " "क्या फेसबुक और व्हाट्सअप की दुनियां 
बच्चों को साहित्य से दूर ले जारही है ?" 

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उर्दू न्यूज रीडर व सुरेंद्र नाथ कालेज की हिंदी प्रध्यापिका  नुसरतजहाँ ने अपने विचार रखते हुए कहा की व्हाट्सअप और फेसबुक फ़ास्ट जीवन शैली है जिसमे साहित्य के लिए कोई समय नहीं है।  स्मार्ट फोन के साथ युवा चाहते है दुनियां को मुट्ठी में कर लेना उनके पास जानकारी प्राप्त करने के लिए तमाम वेबसाइट है किन्तु विषय की गहराई में जाने का वक्त नहीं है उन्हें चार किताबों के नाम दिए जाये और कहा जाये की आप इन्हें पढ़ कर परीक्षा की  तैयारी कर लीजिये तो वे इसे समय की बर्बादी समझते है। आज की पीढ़ी के लिए साहित्य जरूरी नहीं है , न हीं वे समाज संस्कृति और इतिहास में रूचि रखते है।  अट्ठारह से तीस साल के युवाओं  का समय  फेसबुक में लाइक डिसलाइक  में चला जाता है।  बहुत सारे  ब्लाग्स है  लोग अपनी रूचि के अनुसार उन्हें पढ़ कर   कट -पेस्ट करते  है बिना तथ्यों को परखे  जो की कदापि सही नहीं है. 

रंगकर्मी सुधीर निगम के अनुसार आजकल के बच्चों ने अपने को  तकनिकी दुनियां में कैद कर लिया है
  वे इसके बाहर झांकना ही नहीं चाहते। 

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